नालंदा चीरहरण – समाज का आईना
सुबह के दस बजते-बजते मुझे समझ आ गया था कि नालंदा के नूरसराय का जो वीडियो वायरल हो रहा है, उसकी कहानी थोड़ी अलग है। जो लोग वीडियो में एक स्त्री के साथ छेड़खानी करते नजर आ रहे थे, वे दरअसल उस स्त्री के कथित अपराधों की सजा उसे दे रहे थे। हालांकि सजा देते हुए वे उस स्त्री के शरीर को नोचना खसोटना भी जायज समझ रहे थे।
आज जो भी पत्रकार नालंदा के नूरसराय के उस गांव में गए सबसे यह महसूस किया कि पूरा गांव मन ही मन उस स्त्री के खिलाफ है। कहानी बताई गई कि उस स्त्री को एक कमरे में एक युवक के साथ आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ा गया था। चूंकि उस स्त्री ने शादीशुदा होते हुए भी एक पर-पुरुष से प्रेम करने का अपराध किया था, इसलिए गांव की भीड़ उसके साथ इस तरह न्याय कर रही थी।
हालांकि उस स्त्री का वर्जन बिल्कुल अलग है। उसका कहना है कि वह उस युवक से अपनी बेटी के खाते में पैसा ट्रांसफर करवाने गई थी। तभी इस युवकों ने उन दोनों को कमरे में बंद कर दिया। दोनों खिड़की से बाहर निकले तो भीड़ ने दोनों को पकड़ लिया। उन्हें मंदिर के पास ले गए और दोनों की जबरन शादी करवाने लगे।
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पति बिहार से बाहर काम करता है
युवती का पति बिहार से बाहर काम करता है। उसके ससुर गुजर गए हैं, सास बिस्तर पर है। तीन बच्चे हैं, जिनकी और अपने बीमार सास की देखभाल वह अकेले करती है। उस पर बदचलनी का आरोप गांव के लोग लगाते हैं। पूरे गांव में किसी के साथ उसका सहज संबंध नहीं है। हालांकि एक अकेली औरत कैसे सब संभाल रही है, यह कोई नहीं सोचता।
उस गांव के समाज के न्याय का जो तरीका है, उसे हम सबने वीडियो में देखा है। इन दिनों कम से कम बिहार के गांवों में इस तरह की घटनाओं की बाढ़ आई है। गरीब और निम्न मध्यम परिवारों के रिश्ते प्रेम के अभाव में लगातार दरक रहे हैं। पुरुषों का पलायन इनमें एक बड़ी वजह है। मगर पुरानी नैतिकता की दीवार पर खड़ा हमारा समाज न्याय के लिए हमेशा इस तरह के जंगली और हिंसक तरीकों को अपनाता है। इसमें लोगों की अपनी कुंठाओ का भी समावेश होता है।
पुरुषों की यौन भूख जाग उठती
खासकर प्रेम करती स्त्री को देखकर पुरुषों की यौन भूख जाग उठती है और वह न्याय के नाम पर अपने शरीर की भूख मिटाना चाहता है, यह घटना इसका क्लासिक नमूना है।
इस घटना में सबसे अच्छी बात यह हुआ है कि बाहरी समाज ने एक स्वर में इसकी भर्त्सना की है और दोषियों के लिए सख्त सजा की मांग की है। मगर सबसे जरूरी काम यह है कि आपसी सहमति से बन रहे प्रेम या यौन संबंधों को लेकर जिस किस्म का पागलपन समाज पर सवार होता है, उससे बचना। अगर यह अपराध भी है तो उसकी सजा देने के लिए कानून और न्यायालय है।
स्त्री को उसकी यौन इच्छाओं के बदले दंडित करने की मनोवृत्ति खत्म होने में अभी वक्त लगेगा। हालांकि यह दशक इस बात का भी संकेत देता है कि स्त्रियां अब इन प्रवृत्तियों से डर नहीं रही। तभी इतनी बड़ी संख्या में शहर से लेकर गांव तक स्त्रियों के स्वतंत्र रिश्ते बन रहे हैं, शादी से भी इतर। ऐसी खबरों से अखबार रोज भरे मिलते हैं। इसकी अलग से समाजशास्त्रीय व्याख्या की भी जरूरत है।
नोट – यह व्याख्या कहीं से भी इस बात को पूरी तरह सच नहीं मानती है कि उस स्त्री के विवाहेत्तर संबंध रहे होंगे। उस मामले की सच्चाई को सामने लाना, पुलिस और अदालत का काम है। यह बस एक आम विचार है।









