बिहार के नवादा मेसकौर प्रखंड का सीतामढ़ी जिला मुख्यालय से लगभग 35 km दक्षिण पश्चिम छोर पर अवस्थित सीतामढ़ी धार्मिक स्थल यह पावन भूमि यूं तो जगत जननी माता सीता की निर्वासन स्थली और लव-कुश की जन्मस्थली के रूप में विख्यात है। परंतु उसे अनुरूप आज तक सीतामढ़ी का बेहतर विकास नहीं हो सका। हालांकि
सीता की निर्वासन स्थली है को लेकर श्रृषि और पुरातत्वविद एक मत नही हैं। क्योंकि लोग इसकी व्याख्या अभी तक अपने अपने हिसाब से करते रहे हैं। बिहार के नवादा जिले के लोग सीतामढ़ी को हीं सीता की निर्वासन स्थली मानते हैं। सीतामढ़ी और इसके आसपास उपलब्ध प्राचीन साक्ष्यों और गांवों के नाम इसका आधार है। माता सीता मंदिर के मुख्य पुजारी सीताराम पाठक बताते हैं कि भगवान राम ने जब लंका विजय के बाद अयोध्या वापसी के क्रम में धोबी के लांछन लगाने पर जब श्री राम ने माता सीता को निर्वासित किया था तब उन्होंने यहीं आकर पनाह पाया था। माता सीता यहां 11 वर्षों तक रही थीं। आगे इन्होने कहा कि 11 बाय 16 फीट के एक चट्टान पर माता सीता के आग्रह पर भगवान विश्वकर्मा ने मंदिर का निर्माण किया था। यहीं पर बने एक गुफा में लव और कुश का जन्म हुआ था। अयोध्या में श्री राम महायज्ञ करने से पहले अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ा था।जिसे यहीं सीतामढ़ी मे लवकुश के द्वारा पकड़ लिया गया था। जिसके बाद श्रीराम और इनके दो पुत्र लव और कुश के साथ युद्ध हुआ था। गुफा के आगे तीन खंड में चट्टान है। मान्यता है कि सीता माता यहीं धरती माता की गोद में समाई थी।गांव-गांव से जुड़ी हैं माता सीता के निर्वासन की ऐतिहासिक स्मृतियां
📌सीतामढ़ी का नाम सीतामढ़ी कैसे पड़ा
सीतामढ़ी का नाम पहले सीता मरी था जब माता सीता यहीं पाताल में समा गई थी। यानि सीता मरी थी। इसलिए पहले इसका नाम सीता मरी था। बाद में जब लोग गुफा में सीता और लवकुश की प्रतिमा स्थापित कर पूजा करने लगे, तब से यह स्थान सीतामढ़ी कहलाई।
📌बारत गांव का नाम कैसे पड़ा बारत
सीतामढ़ी थाना से 3 किमी की दूरी पर बारत गांव के पास बाल्मिकी श्रृषि का आश्रम है जहां बाल्मीकि ने समाधि ली थी। बारत गांव के ग्रामीण कहते हैं कि बाल्मिकी श्रृषि के चलते उनके गांव का नाम बारत पड़ा। बा यानि बाल्मिकी, र यानि रत और त यानि तपस्या है। ग्रामीण कहते हैं कि बाल्मिकी श्रृषि का क्षेत्र रहा है। इसलिए कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थानों के नाम बाल्मिकी श्रृषि के नाम पर है। आज भी बारत टाल मे ऋषि वाल्मीकि की मंदिर स्थापित है।
📌तिलैया नदी के पास रुकी थी श्रीराम की सेना
बगल में स्थित तिलैया नदी ही प्राचीन तमसा नदी थी।
नदसेना ग्रामवासी कहते हैं कि तिलैया नदी के पास श्रीराम की सेना रूकी थी। इसलिए इसका नाम नदसेना है। वहीं कटघरा में जब हनुमान जी को बंधक बना लिया गया था। इसलिए पहले यह गांव कष्टघरा था। अब बाद में यह गांव कटघरा कहलाया। यही नहीं, श्रीराम जब युद्ध के लिए आए थे तब पहली बार लखौरा में लव कुश को देखें थे। इस जगह का नाम लखौरा पड़ा। लख यानि देखना और उर यानि हृदय। वहीं मोहगांय के समीप राम जी को बच्चों को देखकर मोह आया था, वह स्थल मोहगाय कहलाया।
📌रसलपुरा में युद्ध के समय में राशन की थी व्यवस्था
रसलपुरा में युद्ध के समय राशन की पुरी व्यवस्था थी। पहले वह गांव राशनपुरा के नाम से जाना जाता था, बाद में यह गांव रसलपुरा कहलाया। जब श्री राम ने अश्वमेघ के घोड़ा को छोड़ा था तब इनके दो पुत्र लव और कुश के द्वारा रसलपुरा के पास एक पेड़ में अश्वमेघ के घोड़ा को पकड़ कर बांधा गया था, वह पेड़ अब पत्थर का शिला बन गया है। जिसका प्रमाण आज भी वहां मौजूद है।
📌अरण्य वन के नाम पर गांव का नाम पड़ा अरंडी
सीतामढ़ी से लगभग 5-6 किलोमीटर दूर पर स्थित गांव जिसे लोग आज अरंडी के नाम से जनता है। यह स्थल रामायण काल में अरण्य वन के नाम से विख्यात था। किसी आध्यात्मिक व्यक्ति ने सच कहा था कि जहाँ आस्था जुड़ जाए वहां पुस्तकें मौन हो जाती है ।
📌इस ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व बाबजूद भी यह जगह आज भी किसी तारण हार की राह देख रही है।इस जगह नवादा के जिले के विधायक सांसद अगर चाहते तो यह जगह कब का ही एक पर्यटन बन गया होता और जिससे हजारों लोगों को रोजगार का भी सृजन होता ।
✍️Gauatm









