सांसें थमने के बाद भी पांच शरीर में जिंदा रहेंगे संदीप कुमार
घर से बिजली का बिल भरने निकले थे संदीप SGPGI के चिकित्सा अधीक्षक और SOTTO के नोडल डॉ. राजेश हर्षवर्धन ने बताया कि 42 साल के संदीप कुमार लखनऊ के सुल्तानपुर रोड स्थित अहिमामऊ का निवासी थे। सात फरवरी को वो घर के बिजली का बिल जमा करने जा रहा थे। रास्ते में सड़क हादसे में गंभीर घायल होने पर परिजनों ने कई अस्पतालों में इलाज कराया।हालत बिगड़ने पर शनिवार की शाम SGPGI ट्रामा में भर्ती कराया। रविवार की सुबह डॉक्टरों ने युवक को ब्रेन स्टेम डेथ घोषित किया। पत्नी की ओर से अंगदान की सहमति पर आनन फानन यूरोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. एमएस अंसारी, डॉ. संजय सुरेका और डॉ. संचित ने गुर्दे निकाले। नेफ्रोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. नारायण प्रसाद की टीम ने उन्नाव के बांगरमऊ व मैनपुरी की दो महिला रोगियों में गुर्दे प्रत्यारोपित किये गए। ये दोनों महिलाएं करीब 10 सालों से डायलिसिस पर थी।
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ग्रीन कॉरिडोर से अंग लेकर जाती एंबुलेंस और अंगदान कराने वाली चिकित्सकों की टीम।
लखनऊ। संजय गांधी पीजीआई में लगभग 20 वर्षों के बाद सफल बहु अंगदान की प्रक्रिया पूरी की गई। सड़क हादसे के बाद ब्रेड डेड का शिकार हुए 42 वर्षीय संदीप भले ही अब दुनिया में नहीं रहे, लेकिन उनके अंग अलग-अलग लोगों के शरीर में जिंदा रहेंगे। उनके अंगों ने पांच लोगों को नई जिंदगी और रोशनी दी है। संदीप के इस योगदान के लिए रविवार को अंगदान प्रक्रिया होने के बाद उन्हें गार्ड ऑफ ऑनर भी दिया गया।लखनऊ के रहने वाले संदीप कुमार 7 फरवरी को सड़क हादसे में गंभीर रूप से घायल हो गए थे। विभिन्न अस्पतालों में इलाज के बाद भी उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ। 21 फरवरी की रात उन्हें पीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया। 22 फरवरी को चार वरिष्ठ विशेषज्ञ चिकित्सकों के पैनल ने उन्हें ब्रेन डेड घोषित किया। डॉक्टरों ने उनकी पत्नी व परिजनों को अंगदान के लिए प्रेरित किया। उनकी पत्नी ने अंगदान की सहमति दी। इसके बाद स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (सोटो-यूपी) के संयुक्त निदेशक एवं चिकित्सा अधीक्षक प्रो. राजेश हर्षवर्धन के मार्गदर्शन में अंग प्राप्ति की प्रक्रिया शुरू की गई। पीजीआई और केजीएमयू के विशेषज्ञों की टीमों ने इसे सफलतापूर्वक पूरा किया।
एपेक्स ट्रॉमा सेंटर से इस तरह निकाली गई ब्रेन डेड मरीज की एंबुलेंस।
संदीप का लिवर ग्रीन काॅरिडोर बनाकर समय रहते केजीएमयू पहुंचाया गया जहां प्रतीक्षा सूची में पंजीकृत मरीज में उसे सफलतापूर्वक प्रत्यारोपित किया गया।
दोनों किडनी 35 से 40 वर्ष आयु वर्ग की दो महिलाओं को लगाई गईं, जो पिछले कई वर्षों से डायलिसिस पर थीं।
कॉर्निया निकालने की प्रक्रिया भी सफलतापूर्वक पूरी की गई। दोनों कॉर्निया को केजीएमयू के सामुदायिक नेत्र बैंक को सौंपा गया, जिसे प्रतीक्षा सूची के दो नेत्रहीन मरीजों लगाया जाएगा।
संस्थान के निदेशक डॉ. आरके धीमन ने इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए कहा कि एपेक्स ट्रॉमा सेंटर की नीति के तहत ब्रेन डेथ के मामलों में यदि परिजन अंगदान की सहमति देते हैं तो सहमति के समय से संपूर्ण उपचार का खर्च माफ किया जाता है। दिवंगत अपने पीछे पत्नी और आठ वर्षीय पुत्र को छोड़ गए हैं। परिवार के इस ऐतिहासिक फैसले ने पांच लोगों को नया जीवन दिया, बल्कि समाज को अंगदान के प्रति जागरूक करने का प्रेरक संदेश भी दिया है।
एम्बुलेंस देख लोग ट्रैफिक को सपोर्ट देते नजर आए
लखनऊ में ग्रीन कॉरिडोर बनने से अचानक रविवार शाम हजरतगंज चौराहे का ट्रैफिक थम गया। लखनऊ पुलिस की मुस्तैदी का नतीजा यह रहा कि बिना किसी व्यवधान के महज 18 मिनट के भीतर एंबुलेंस KGMU पहुंच गई। इस दौरान आम लोगों भी एम्बुलेंस देख ट्रैफिक सपोर्ट देने के लिए ठहरते नजर आए।
पुलिस के अनुसार, ब्रेन डेड मरीज की एंबुलेंस को शाम 6:14 बजे SGPGI से निकाला गया। उसके बाद 2 गाड़ियों से एस्कॉर्ट करते हुए 6:32 बजे KGMU पहुंचा दिया गया। इस दौरान तेलीबाग-कैंट-हजरतगंज रूट से एंबुलेंस निकाली गई। रास्ते में पड़ने वाले सभी ट्रैफिक पोस्ट और चौकियों को पहले से अलर्ट कर दिया गया था
इन डॉक्टरों ने निकाला लिवर SGPGI की गैस्ट्रो सर्जन डॉ. सुप्रिया शर्मा और डॉ. राहुल ने युवक का लिवर निकाला। KGMU डॉक्टरों की टीम ने लिवर रोग से पीड़ित मरीज को लिवर प्रत्यारोपण की कार्रवाई शुरू की। KGMU प्रवक्ता डॉ. केके सिंह ने बताया कि डॉ. अभिजीत चंद्रा की अगुआई में टीम लिवर ट्रांसप्लांट करेंगे। करीब 8 से 9 घंटे के समय में लिवर ट्रांसप्लांट पूरा होगा।
ग्रीन कॉरिडोर से अंग लेकर जाती एंबुलेंस और अंगदान कराने वाली चिकित्सकों की टीम।
उन्होंने दावा किया कि करीब 20 साल बाद SGPGI को खुद ऐसा ब्रेन डेड मरीज मिला है, जिसके ऑर्गन्स से जरूरतमंदों को नई जिंदगी दी जा सके। इससे पहले जब मैं खुद यहां का रेजिडेंट डॉक्टर था, तब एक ऐसा अवसर मिला था। अच्छी बात यह है कि लोग ऑर्गन ट्रांसप्लांट को लेकर जागरूक हो रहे हैं।









