नवादा से लेकर नालंदा तक, भभुआ से लेकर बेगूसराय तक, नदियां सिमटकर नाले में तब्दील हो गई है
नवादा से लेकर नालंदा तक भभुआ से लेकर बेगूसराय तक नदियां सिमटकर नाले में तब्दील हो गई है। सोन, गंगा और गंडक जैसी बड़ी नदियां भी अपनी चौड़ाई खो रहीयह जून का समय नहीं, बल्कि फरवरी का महीना है
बिहार की अधिकतर नदियां सूख चुकी हैं। कभी जहां नावें चला करती थीं, अब वहां सिर्फ बालू के टीले हैं। नवादा से लेकर नालंदा तक, भभुआ से लेकर बेगूसराय तक, नदियां सिमटकर नाले में तब्दील हो गई है। सोन गंगा और गंडक जैसी बड़ी नदियां भी अपनी चौड़ाई खो रही हैं। यह संकेत है कि अगर अभी नहीं संभले, तो आने वाला कल और सूखा होगा।
नवादा की खुरी हो या नालंदा की पंचाने, भोजपुर की धर्मावती या फिर भभुआ की कर्मनाशा तमाम नदियां अब बस नाम की रह गई हैं।
सारण की दाहा नदी जो 96 किलोमीटर लंबी थी, लेकिन आज उसकी धारा तक मिट गई है। क्या यह सिर्फ जलवायु परिवर्तन है या हमारी लापरवाही ने नदियों का यह हाल किया है। अगर अभी से ठोस जल संरक्षण, गाद सफाई और नदी पुनर्जीवन की पहल नहीं हुई, तो गर्मी आते-आते यह संकट विकराल रूप ले सकता है।
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गर्मी आते-आते यह संकट विकराल रूप ले सकता है।
सकरी, धनार्जय, तिलैया और ढाढर जैसी नदियां फरवरी में ही दम तोड़ती दिख रही हैं। दशकों पहले मार्च-अप्रैल तक इन नदियों में 4 से 5 फीट गहरा पानी रहता था और साल के 8-9 महीने जल उपलब्ध रहता था। आज 1,500 से 2,000 वर्ग किलोमीटर के जलग्रहण क्षेत्र के बावजूद नदियां केवल बरसात तक सीमित रह गई हैं। भूजल स्तर गिरने से सोते सूख गए हैं और ‘चुआं’ की परंपरा भी खत्म हो गई है।
भभुआ (कैमूर) में सुवरा, दुर्गावती, कर्मनाशा, कुदरा, गोरेया, धर्मावती और कुकुरनहिया नदियों में कहीं छिछला तो कहीं 5-6 फुट पानी है। अधौरा, भगवानपुर, रामपुर और भभुआ प्रखंडों में कई स्थानों पर धारा टूटने लगी है। जो नदियां पहले सदावाही थीं, अब बरसाती बन गई हैं। इन नदियों में बरसात में करीब 12 फुट पानी रहता है। सासाराम में सबसे बड़ी नदी सोन है, जो मध्य प्रदेश के अमरकंटक से निकलती है। वर्तमान में सोन में 7115 क्यूसेक पानी है और प्रवाह बनाए रखने के लिए सोन बराज का एक गेट खोला गया है।
बूढ़ी गंडक के पानी की गुणवत्ता बिगड़ रही:
उत्तर बिहार के लिए जीवनदायिनी बूढ़ी गंडक नदी के पानी की गुणवत्ता मौसम के साथ बदल रही है। बीआरए बिहार विश्वविद्यालय में हुए एक शोध में यह खुलासा हुआ है। शोध में सामने आया है कि सर्दी-गर्मी के मौसम में नदी का जल गुणवत्ता सूचकांक (डब्ल्यूक्यूआई) ‘अच्छा’ श्रेणी में रहता है, जबकि मानसून के दौरान ज्यादातर स्थानों पर यह ‘खराब’ श्रेणी में पहुंच जाता है। यह शोध गर्मी, बरसात और सर्दी में बूढ़ी गंडक के तीन अलग-अलग स्थानों अखाड़ाघाट, कांटी व मोतीपुर से पानी के नमूने एकत्र कर किया गया है।
एक नजर में:
बिहारशरीफ (नालंदा) में स्थिति और गंभीर है। जिले की छोटी-बड़ी 40 नदियां फरवरी में ही सूख गई हैं। पंचाने, मुहाने, लोकाइन, जिराइन, सकरी और पैमार जैसी बड़ी नदियों में भी पानी नहीं है। औसत भू-गर्भ जलस्तर 44 फीट पर पहुंच गया है। अब केवल चार माह ही नदियों में पानी टिक पाता है।
बक्सर में कंचन और काव नदियों की धारा सूखने से मानव जीवन पर संकट है। अतिक्रमण और कचरे ने नदियों को नाला बना दिया है। पांच साल पहले जहां पानी लबालब रहता था, अब फरवरी में ही जलस्तर गिर गया है।
गोपालगंज में गंडक, दाहा, सोना, छाड़ी, धमई, स्याही और घोघारी नदियों का जलस्तर तेजी से घटा है। गंडक की धार 30 से 40 मीटर में सिमट गई है और 75 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है। दाहा नदी का बहाव पूरी तरह बंद है। सारण में फरवरी में ही जलस्तर आधा रह गया है। जहां पहले 10 मीटर तक पानी रहता था, अब 5 मीटर रह गया है।
जहानाबाद में फल्गु, मोरहर, दरधा, यमूने और बलदईया नदियां सूख चुकी हैं। पहले फल्गु और यमुने में मार्च तक धारा रहती थी। बालू खत्म होने से जलस्रोत भी समाप्त हो गए हैं
भोजपुर में गंगा और सोन के अलावा धर्मावती, पश्चिमी गांगी, पूर्वी गांगी, कुम्हरी और काव नदियां गाद और अतिक्रमण से प्रभावित हैं। बेगूसराय के सिमरिया में गंगा का जलस्तर घटकर 34.56 मीटर रह गया है औरंगाबाद में पुनपुन, बटाने, बतरे, केशहर, मदाड़ और मोरहर नदियों में पानी नहीं है









