इंसाफ का सन्नाटा और सुलगता बिहार

इंसाफ का सन्नाटा और सुलगता बिहार

 

मौन है, लहू बोल रहा है,कहाँ गई वो सुशासन की बातें, कहाँ गया वो दावा?

सरेआम जब कटता सिर है, धधक रहा पछतावा।

 

अररिया की माटी पूछ रही, ये कैसी अंधी रात है? अपराधी के हाथ में खंजर, प्रशासन के क्या हाथ हैं?

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दिन-दहाड़े दरिंदगी का, नंगा नाच यहाँ होता है, खाकी केवल तमाशा देखे, कानून घर में सोता है।

 

खौफ नहीं अब जेल का उनको, न ही फांसी का डर है,क्या आम आदमी के लिए सुरक्षित, अब अपना ही घर है?

 

कागजों पर जो सख्त दिखे, वो ढाल कहाँ अब गायब है? अपराधी की पीठ थपथपाता, कौन सा वो साहेब है?

 

बेपटरी हुई व्यवस्था सारी, बेलगाम हुए हैं गुंडे, सत्ता के गलियारों में क्यों, डले हुए हैं कुंडे?

 

पर देखो! जब सत्ता सोई, तो जनता का धीरज टूटा है, कानून के रखवालों से अब, हर भरोसा छूटा है।

 

वो भीड़ नहीं थी सड़कों पर, वो व्यवस्था की लाचारी थी, जब खुद ही इंसाफ किया उसने, जिसकी बारी सरकारी थी।

 

क्या यही सुशासन है तुम्हारा? जहाँ न्याय सड़क पर होता है, जहाँ बेबस होकर आम आदमी, अपना संयम खोता है?

 

अपराधी को भीड़ ने मारा, क्योंकि थाने मौन खड़े थे, न्याय की फाइल धूल फांकती, और पाप के कद बड़े थे।

 

जागो ओ कुर्सी के वारिस, जनता अब उबल रही है, तुम्हारी चुप्पी की आग में, मानवता ही जल रही है।

 

सजा दिलाओ उन दरिंदों को, या फिर गद्दी छोड़ो तुम, इंसाफ नहीं दे सकते तो, नाता हमसे तोड़ो तुम।

 

भीड़ का न्याय बताता है कि, सरकार तुम्हारी सोई है, लहू से सनी इन गलियों में, हर उम्मीद अब रोई है।

 

लहू पुकारे सड़कों पर, अब न्याय का सूरज उगना होगा, वरना इस बेबस जनता को, बगावत पर ही मुड़ना होगा।

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