आजीवन महिला की वेशभूषा में संत झुनकिया बाबा का बीता जीवन

संत समुदाय में उन्हें जानकी शरण कहा जाता था

अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के प्राणप्रतिष्ठा को लेकर उत्सव सा माहौल है। रामकी आस्था से जुड़ी कई कहानियां है। रामकी जन्मस्थली अयोध्या से जुड़ी नवादा कीदो कहानियां है। एक कहानी नवादा जिले केपकरीबरावां प्रखंड के केशौरी गांव निवासीसंत जानकी शरण उर्फ झुनकिया बाबा सेजुड़ी है, जिनका श्रीराम से जुड़ी अटूटआस्था से जुड़ी है। दूसरी कहानी गोविंदपुरप्रखंड के बुधवारा गांव निवासी काशीदाससे जुड़ी है, जिन्होंने श्रीराम की आस्था मेंरामायण भवन का निर्माण करवाए थे। दोनोंसंत थे। लेकिन आस्था ऐसी थी कि जनसहयोग से श्रीराम की स्मृति में सियारामकिला और रामायण और गीता भवन कानिर्माण करवा दिए। ये आज भी अयोध्याके लिए बड़ी थाती है। संत जानकी शरणउर्फ झुनकिया बाबा सखी संप्रदाय के थे। वेश्रीराम को सखी की भावना से अराधनाकरते थे।

उन्होंने 16 साल तक कठिन तपस्या की।

झुनकिया बाबा खुद को सीता कीसहेली मानते थे और श्रीराम को बहनोई।झुनकिया बाबा खुद को सीता की करीबरहनेवाली चंद्रकला जू का अवतरित मानतेथे। वह श्रीराम को गारी देते थे। भाड़ी देतेथे। यही नहीं, श्रीराम की आस्था में वहमहिला जैसा कपड़ा सलवार समीज पहनतेथे। अनुयायी राजेश कुमार श्री कहते हैं किझुनकिया बाबा भगवान से मिलने का हथका प्रण ले लिए थे। करीब 16 साल कीतपस्या के बाद श्रीराम का दर्शन हुआ था।आज भी सखी संप्रदाय की तादाद बड़ी है।वह महिला जैसा नथुनी, पायल, कान मेंबाली और मंगटीका, चुड़ी और सिकरी जैसेआभूषण पहनते थे। मगध में आज भीउनके सखी संप्रदाय के माननेवालों कीबड़ी तादाद है।

संत काशीदास ने बनवायाथा रामायण भवननवादा के लोगों की राम कीआस्था की कहानी यहीं खत्म नहीहोती है। गोविंदपुर प्रखंड केबुधवारा गांव निवासी काशीदास नेअयोध्या में रामायण भवन कानिर्माण करवाए। इसे लोग रामायणीभवन कहते हैं। पूरे भवन मेंरामायण अंकित किया गया है। रामसीता का चरित चित्रण है। यहीनहीं, भगवान श्रीकृष्ण की आस्थामें गीता भवन भी बनवाया गया है।रामायण और गीता भवन आज भीअयोध्या की बड़ी थाती है।

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उन्होंने आजीवन सखी (महिला) वेशभूषा में भगवान राम की उपासना की।

12 साल की आयु में छोड़ दिए थे घर परिवारकेसौरी निवासी झुनकिया बाबा की कहानी अनूठी है। साहित्यकार रामरतन प्रसाद सिंह र|ाकर कहते हैं कि झुनकिया बाबा के बचपन कानाम यमुना था। उन्हें बचपन से भगवान से मिलने की उत्कंठा थी।एक दिन गाय चराने गए। उसके बाद कई सालों तक घर नही लौटे।बाद में अयोध्या में सियाराम किला का निर्माण करवाए। सरयू तट परपहला पक्का घाट बनवाने का श्रेय भी झुनकिया बाबा को जाता है।झुनकिया बाबा के अनुयायी सीताराम सिंह कहते हैं कि गोलाघाट केमहंथ रामबल्लभा शरणजी महाराज ने देव युगलमंत्र देकर भगवतप्राप्ति के लिए आगे का रास्ता दिखाया। उसके बाद 16 साल तकतपस्या किए। भगवान को आकर दर्शन देना पड़ा था। संत समुदाय मेंउनका नाम जानकी शरण था, लेकिन वेशभूषा के कारण झुनकियाबाबा कहा जाता है। 1995 में अपनी मौत की तिथि और समय पहलेबता दिए थे।मगध के कई जगहों पर उनकी व्यापक पूजा होती है।लोग उन्हें भगवान स्वरूप पूजा करते हैं।

झुनकिया बाबा का बचपन का नाम यमुना था, और वे नवादा जिले के कैशौरी गाँव के निवासी थे, उनके पिता दुबरी सिंह थे।

मगध क्षेत्र में उनकी पूजा भगवान के रूप में की जाती है।

उन्होंने अयोध्या में सरयू तट पर झुनकीघाट नामक सबसे पहला पक्का स्नानघाट बनवाया और वहां सिद्धपीठ सियाराम किला स्थापित किया।

 गोलाघाट के महंत रामवल्लभा शरणजी से दीक्षा लेकरमगध क्षेत्र में उनकी पूजा भगवान के रूप में की जाती है।

संत समुदाय में उन्हें जानकी शरण कहा जाता था, लेकिन अपनी वेशभूषा के कारण वे झुनकिया बाबा के रूप में प्रसिद्ध हुए।

मगध क्षेत्र में उनकी पूजा भगवान के रूप में की जाती है।
नोट: उक्त जानकारी गूगल पर उपलब्ध है।
इनके चमत्कार की बातें जो आम जन में प्रचलित हैं किंतु गूगल पर नहीं है उनमें से कुछ .

जिनको जो कह देते, वही होता था।
एक बार किसी धर्मशाला में सैकड़ों की संख्या में सांप आ गया किंतु इनके पहुंचते ही सभी सांप गायब हो गए।
एक बार इनके गांव में यज्ञ के भोज में घी की कमी हो गई तो बगल के पोखर के जल को ही घी में परिवर्तित कर दिए।
उक्त घटनाओं को विस्तार से नहीं लिख रहा हूं किंतु इसके कई युवा और बुजुर्ग चश्मदीद अभी भी हैं।
मैंने उन्हें नहीं देखा किंतु केसौरी में मेरे बहन की शादी है इस कारण लोगों से पूछताछ में कई चमत्कार की बातें सुनता हूं।

ऐसी बातों में मुझे इसलिए भी विश्वास है कि मैंने स्वयं भी ऐसी चमत्कारी शक्तियों को देखा है जो विज्ञान से परे है।
वही तो है परा विज्ञान जिसे मैं प्रज्ञा कहता हूं..

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