पटना लोकसभा सीट जिसका 2008 में जब परिसीमन हुआ तो वह दो लोकसभा सीटों में बदल गई. एक सीट पाटलिपुत्र बन गई तो दूसरी पटना साहिब लोकसभा सीट बन गई. दोनों सीटों पर इस वक्त भाजपा का कब्जा है. पटना साहिब सीट से भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस उम्मीदवार शत्रुघ्न सिन्हा को भारी मतों से 2019 के लोकसभा चुनाव हराया तो वहीं पाटलिपुत्र लोकसभा सीट पर लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा भारती को भाजपा के सांसद रामकृपाल यादव ने दूसरी बार चुनावों में मात दी. पाटलिपुत्र सीट पर 2009 में लालू प्रसाद यादव ने भी चुनाव लड़ा था लेकिन नीतीश कुमार की जदयू के रंजन प्रसाद यादव ने उन्हें हरा दिया. वहीं 2009 के पटना साहिब लोकसभा सीट पर चुनाव बड़ा ही दिलचस्प रहा था क्योंकि बॉलीवुड की दो हस्तियां चुनावी मैदान में आमने-सामने थीं. भाजपा ने चर्चित फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा और कांग्रेस ने फिल्म अभिनेता शेखर सुमन को चुनावी मैदान में उतारा था. हालांकि इस चुनाव में बीजेपी उम्मीदवार शत्रुघ्न सिन्हा की जीत हुई थी. आपको बता दें कि शत्रुघ्न सिन्हा ने 2009 और 2014 का चुनाव भाजपा की टिकट पर लड़ा था और जीत हासिल की थी लेकिन वर्ष 2019 में कांग्रेस की टिकट पर पटना साहिब से चुनाव लड़ा था लेकिन हार का सामना करना पड़ा था. तीन चुनावों के दौरान शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी और बॉलीवुड अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा कभी अपने पिता के प्रचार के लिए नहीं गईं.
पटना को कभी महान सम्राट अशोक की राजधानी पाटलिपुत्र के रूप में जाना जाता था. इस सीट ने सत्ता के उत्थान-पतन को नजदीक से देखा है. यह सीट प्राचीन और आधुनिक शासन के घटनाक्रम की गवाह रही है. आजादी के बाद 1952 में मेरे नाम पर चार लोकसभा क्षेत्र थे- पाटलिपुत्र, पटना सेंट्रल, पटना पूर्वी और पटना सह शाहाबाद. 1957 के दूसरे आम चुनाव में पटना लोकसभा क्षेत्र बना और इसका अस्तित्व 2008 तक रहा. 2009 के चुनाव में यह दो लोकसभा क्षेत्रों में विभाजित हो गया, पाटलिपुत्र और पटना साहिब. आजादी के चार साल बाद भारत में पहली बार लोकसभा का चुनाव हुआ. लोकतांत्रिक संप्रभु भारतीय गणतंत्र के लिए यह चुनाव एक ऐतिहासिक पल था. अंग्रेजों के अत्याचार और शोषण से मुक्त भारत दुनिया के सामने लोकतंत्र की एक नई मशाल जल रही थी और चुनौतियां बहुत थीं, लेकिन जन-गण के उत्साह के सामने वे कम पड़ गईं. 1952 में इस लोकसभा सीट से जुड़ी सभी चार सीटों पर कांग्रेस की जीत हुई थी. तब आबादी कम थी इसलिए मतदाताओं की संख्या भी कम थी. वोट करने की न्यूनतम उम्र 21 साल थी. साठ-सत्तर हजार वोट लाकर भी लोग लोकसभा का चुनाव जीत जाते थे. पाटलिपुत्र सीट पर कांग्रेस के सारंगधर सिंह और सोशलिस्ट पार्टी के ज्ञानचंद के बीच मुकाबला हुआ. सांरगधर सिंह को 64992 मत मिले जब कि ज्ञानचंद को 38294 मत से ही संतोष करना पड़ा. सारंगधर सिंह शिक्षाविद थे. सांसद बनने के पहले वे पटना विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर (1949-52) थे.
देश को पहली महिला सांसद मिलीं
पटना सेंट्रल निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस के कैलाशपति सिन्हा को 66982 मत मिले. निर्दलीय उम्मीदवार चंद्रिका सिंह उन्हें चुनौती दे रही थी, चंद्रिका सिंह को केवल 20581 मत मिले और वे चुनाव हार गए. पटना पूर्वी चुनाव क्षेत्र में कांग्रेस की तारकेश्वरी सिन्हा और सोशलिस्ट पार्टी के वीपी जवाहर के बीच मुकाबला हुआ. तारकेश्वरी सिन्हा को 62238 और बीपी जवाहर को 29388 मत मिले. तारकेश्वरी सिन्हा केवल 26 साल की उम्र में सांसद बन गई थीं. उन्होंने लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से पढ़ाई की थी. ओजस्वी वक्ता थीं. अर्थशास्त्र की जानकार होने के कारण प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें 1958 में वित्त राज्यमंत्री बनाया था. इस पद पर पहुंचने वाली वे भारत की पहली महिला सांसद हैं.
पटना सह शाहाबाद चुनाव क्षेत्र में कांग्रेस के बलिराम भगत ने सोशलिस्ट पार्टी के देवेन्द्र प्रसाद सिंह को हराया था. बलिराम भगत को 69428 और देवेन्द्र प्रसाद सिंह को 23688 मत मिले थे. बलिराम भगत भी अर्थशास्त्र के ज्ञाता थे. इसी कारण उन्हें 1963 में योजना राज्यमंत्री बनाया गया था और बाद में वे लोकसभा के अध्यक्ष भी बने थे.
जब मौजूदा सांसद ने चुनाव लड़ने से कर दिया था इनकार
1957 में लोकसभा का दूसरा आम चुनाव हुआ. पाटलिपुत्र की जगह पटना लोकसभा क्षेत्र अस्तित्व में आया. 1952 में इस सीट पर सांरगधर सिंह विजयी हुए थे. 1957 पटना लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने सारंगधर सिंह को फिर उम्मीदवार बनाया. भाकपा के रामावतार शास्त्री ने उन्हें चुनौती दी. मुकाबला जोरदार रहा, लेकिन जीत सांरगधर सिंह को मिली. सांरगधर सिंह को 75618 और रामावतार शास्त्री को 66936 वोट मिले. 1962 के तीसरे लोकसभा चुनाव में सारंगधर सिंह ने अपने राजनीतिक आदर्शों की मिसाल पेश की. उन्होंने ऐलान कर दिया कि इस चुनाव में न तो वे उम्मीदवार बनेंगे और न ही उनके परिवार का कोई सदस्य चुनाव लड़ेगा. कांग्रेस के नेता उनके इस फैसले से अमंजस में पड़ गए. सारंगधर सिंह राजनीति में परिवारवाद के खिलाफ थे. उन्होंने खुद सुझाव दिया कि उनकी जगह कांग्रेस की युवा महिला नेत्री रामदुलारी सिन्हा को उम्मीदवार बनाया जाए. कांग्रेस पार्टी ने यह सुझाव मान लिया. पटना लोकसभा सीट पर रामदुलारी सिन्हा के खिलाफ भाकपा के रामावतार शास्त्री फिर मैदान में उतरे. रामदुलारी सिन्हा ने रामावतार शास्त्री को आसानी से हरा दिया. रामदुलारी सिन्हा को 101687 और रामावतार शास्त्री को 76605 मत मिले.
जवाहर लाल नेहरू के गुजर जाने से कांग्रेस पहले की तुलना में कमजोर हो गई थी
नेहरू के देहांत के बाद बदल गई राजनीतिक फिजा
जब 1967 में चौथा आम चुनाव हुआ, तो देश की राजनीतिक फिजा बदल रही थी. जवाहर लाल नेहरू के गुजर जाने से कांग्रेस पहले की तुलना में कमजोर हो गई थी. समाजवादी धारा के दलों का प्रभाव बढ़ गया था. पटना लोकसभा सीट भी बदलाव के बयार से अछूती न थी. दो बार से चुनाव हार रहे भाकपा के रामावतार शास्त्री ने इस बार कमाल कर दिया. उन्होंने कांग्रेस की रामदुलारी सिन्हा को करारी शिकस्त दी. रामावतार शास्त्री को 1 लाख 48 हजार 963 मत जब कि रामदुलारी सिन्हा को 66 हजार 822 मत मिले. कांग्रेस के गढ़ को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने छीन लिया था. पटना लोकसभा सीट पर कांग्रेस का प्रभाव इतना कम हो गया कि उसे दोबारा जीत हासिल करने में 22 साल लग गए.
इंदिरा गांधी को एक साल पहले चुनाव कराने पर 1971 में फायदा मिला
इंदिरा लहर में भी जब कांग्रेस जीत नहीं सकी ये सीट
तय मियाद के हिसाब से पांचवां लोकसभा चुनाव 1972 में होना चाहिए था, लेकिन राजनीतिक कारणों से इसे एक साल पहले 1971 में कराया गया. कांग्रेस में विभाजन के बावजूद उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का देश की राजनीति में जबर्दस्त प्रभाव था. इंदिरा गांधी को एक साल पहले चुनाव कराने का फायदा मिला. बिहार में कांग्रेस को सबसे अधिक 39 सीटें मिलीं, लेकिन वह पटना लोकसभा सीट पर हार गई. रामावतार शास्त्री ने इंदिरा लहर में भी अपनी सीट बरकरार रखी. इस बार उनके वोटों की संख्या पहले से भी बढ़ गई. उन्हें 1 लाख 91 हजार 911 वोट मिले जब कि उनके प्रतिद्वंद्वी भारतीय जनसंघ के कैलाशपति मिश्रा को 1 लाख 14 हजार 485 वोट मिले.
रामावतार शास्त्री और महामाया प्रसाद सिन्हा के बीच चला जीत-हार का युद्ध
इमरजेंसी के निरंकुश शासन के बाद 1977 में लोकसभा का चुनाव हुआ. कांग्रेस के खिलाफ देशभर में प्रचंड लहर बह रही थी. जनता पार्टी की तरफ लोग आशा भरी नजरों से देख हे थे. जनता पार्टी ने पटना लोकसभा सीट पर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद सिन्हा को उम्मीदवार बनाया था. वे भाषण देने में निपुण थे. जनसभाओं में जब वे युवा वर्ग को ‘मेरे जिगर के टुकड़ों’ कह कर संबोधित करते थे. हर्षध्वनि की कोई सीमा न रहती. 1977 में महामाया प्रसाद सिन्हा ने भाकपा के रामावतार शास्त्री के विजय रथ को रोक लिया. महामाया प्रसाद सिन्हा को अपार जनसमर्थन मिला. उन्हें 3 लाख 82 हजार 363 वोट मिले जब कि रामावतार शास्त्री को केवल 59 लाख 238 वोट ही मिले. भाकपा नेता रामावतार शास्त्री जुझारू नेता थे. जनता से उनका जुड़ाव था. 1980 में जब लोकसभा का मध्यावधि चुनाव हुआ तो उन्होंने अपनी खोई सीट फिर हासिल कर ली. जनता पार्टी के टूट-फूट के बाद 1980 में एक बार फिर इंदिरा गांधी की लहर चली, लेकिन पटना लोकसभा सीट इस लहर से अछूती रही. रामावतार शास्त्री ने जनता पार्टी के महामाया प्रसाद सिन्हा को हरा कर तीसरी बार यह जीत हासिल की. रामावतार शास्त्री को 1 लाख 67 हजार 290 वोट और महामाया प्रसाद सिन्हा को 1 लाख 46 हजार 877 वोट मिले.
जब कांग्रेस का सूखा 22 साल बाद हुआ खत्म
1984 में 22 साल बाद कांग्रेस को पटना लोकसभा सीट पर दोबारा जीत मिली. कांग्रेस ने बिहार के प्रसिद्ध डॉक्टर सीपी ठाकुर को मैदान में उतारा और कांग्रेस कामयाब रही. डॉ. सी पी ठाकुर ने भाकपा के रामावतार शास्त्री को बड़े अंतर से हरा दिया. डॉ. सीपी ठाकुर को 2 लाख 14 हजार 989 मत और रामावतार शास्त्री को 1 लाख 42 हजार 808 मत मिले. राजनीति का मौसम एक बार फिर बदला. देश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी प्रमुख जगह बना रही थी. 1989 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने पटना लोकसभा सीट पर पटना विश्वविद्यालय के प्रोफेसर शैलेन्द्र नाथ श्रीवास्तव को मैदान में उतारा. उन्होंने कांग्रेस के सांसद डॉ. सीपी ठाकुर को हरा दिया, लेकिन 1991 के आते-आते राजनीति मौकापरस्ती और तिकड़मों के जाल में उलझ गई.
बूथ लूट और चुनाव आयोग ने रद्द किया था चुनाव
1991 के लोकसभा चुनाव में पटना सीट पर जबर्दस्त चुनावी धांधली का आरोप लगा. तब लालू प्रसाद बिहार के मुख्यमंत्री थे. जनता दल में उनका बहुत प्रभाव था. उनकी पहल पर इंद्र कुमार गुजराल को पटना से जनता दल का उम्मीदवार बनाया गया था, चूंकि 1991 में चुनाव की नौबत इसलिए आई थी क्योंकि कांग्रेस ने चंद्रशेखर सरकार गिरा दी थी. गुजराल के सामने चंद्रशेखर सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा खड़े थे. जब चुनाव हुआ तो बूथ लूट के आरोपों से यह लोकसभा क्षेत्र सुर्खियों में आ गया. बूथ लुटेरों के सामने प्रशासन लाचार बना रहा. जांच में गड़बड़ी पाए जाने के बाद चुनाव आयोग ने पटना का चुनाव रद्द कर दिया. फिर यह मामला कोर्ट-कचहरी में चला गया.
1996 में रामकृपाल यादव ने इस सीट पर फिर जीत हासिल की.
लालू ने अपने करीबी रामकृपाल यादव को बनाया उम्मीदवार
आखिरकार 1993 में पटना लोकसभा सीट पर फिर चुनाव कराया गया. इस बार लालू प्रसाद ने अपने करीबी रामकृपाल यादव को जनता दल का उम्मीदवार बनाया. उस समय रामकृपाल यादव एमएलसी थे. इस चुनाव में रामकृपाल यादव को जीत मिली. 1996 में रामकृपाल यादव ने इस सीट पर फिर जीत हासिल की. अप्रैल 1997 में जब इंद्र कुमार गुजराल भारत के प्रधानमंत्री बने थे तब वे बिहार से ही राज्यसभा के सदस्य थे. राज्यसभा सदस्य के रूप में उनका जो पता दर्ज था वह पटना के सब्जीबाग मुहल्ले का था. लालू प्रसाद ने ही उन्हें राज्यसभा में भेजा था.
लालू प्रसाद का चला सिक्का
केन्द्र में इंद्रकुमार गुजराल की सरकार के पतन के बाद एक बार फिर भाजपा को उभार मिला. 1998 के लोकसभा चुनाव के समय कांग्रेस के पूर्व सांसद डॉ. सीपी ठाकुर भाजपा में आ गए. भाजपा ने उन्हें उम्मीदवार बनाया. उन्होंने जनता दल के सांसद रामकृपाल यादव को हरा कर इस सीट पर एक बार फिर भाजपा झंडा फहरा दिया. 1999 के लोकसभा चुनाव में सीपी ठाकुर ने ये सीट बरकरार रखी. 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के खिलाफ हवा चली. बिहार में फिर लालू प्रसाद का सिक्का चला. इस सीट पर राजद के रामकृपाल यादव ने भाजपा के सीपी ठाकुर को हरा दिया. 2008 में परिसीमन के बाद पटना लोकसभा का स्वरूप बदल गया. पाटलिपुत्र और पटना साहिब दो नये चुनाव क्षेत्र बने.
जदयू के रंजन प्रसाद यादव ने लालू प्रसाद जैसै दिग्गज को हरा कर तहलका मचा दिया था.
जब लालू भी हार गए चुनाव
2009 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने पटना साहिब लोकसभा सीट पर चर्चित फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को मैदान में उतारा था. राजद ने विजय कुमार को उम्मीदवार बनाया था. कांग्रेस ने एक और फिल्म अभिनेता शेखर सुमन पर दांव खेला था, लेकिन बाजी मारी थी शत्रुघ्न सिन्हा ने मारी. 2009 में पाटलिपुत्र सीट पर भाजपा के सहयोगी दल जदयू के रंजन प्रसाद यादव ने लालू प्रसाद जैसै दिग्गज को हरा कर तहलका मचा दिया था. 2014 में भाजपा का प्रभाव और बढ़ा. पटना साहिब सीट पर शत्रुघ्न सिन्हा को दोबार जीत मिली. तब तक राजद के पूर्व सांसद रामकृपाल यादव भाजपा में आ गए थे. भाजपा ने उन्हें पाटलिपुत्र सीट से उम्मीदवार बनाया था. इस सीट से लालू प्रसाद की पुत्री डॉ, मीसा भारती चुनाव लड़ रहीं थीं. रामकृपाल यादव ने मीसा भारती को हरा कर यह सीट भाजपा की झोली में डाल दी. 2019 के चुनाव में पटना साहिब सीट का परिदृश्य बदल गया. भाजपा के सांसद शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस में शामिल हो गए. तब भाजपा ने इस सीट से रविशंकर प्रसाद को उम्मीदवार बना दिया. रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस प्रत्याशी शत्रुघ्न सिन्हा को विशाल अंतर से मात दे दी. पाटलिपुत्र सीट पर भाजपा के रामकृपाल यादव ने मीसा भारती को लगातार दूसरी बार हराया.
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FIRST PUBLISHED : January 23, 2024, 14:24 IST









